फुल्लारा अट्टहास शक्तिपीठ – पश्चिम बंगाल की हँसती हुई देवी

फुल्लारा अट्टहास शक्तिपीठ – पौराणिक कथा
सनातन परंपरा के अनुसार, फुल्लारा अट्टहास शक्तिपीठ की उत्पत्ति दक्ष यज्ञ की कथा से जुड़ी मानी जाती है।
पौराणिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि दक्ष प्रजापति द्वारा भगवान शिव के अपमान से व्यथित होकर माता सती यज्ञ स्थल पर पहुँचीं। वहाँ हुए अपमान को सहन न कर पाने पर उन्होंने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर का त्याग किया।
मान्यता है कि इसके पश्चात भगवान शिव अत्यंत शोकाकुल होकर तांडव करने लगे। सृष्टि संतुलन की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया, जिनके विभिन्न अंग अलग-अलग स्थलों पर गिरे।
लोकपरंपरा के अनुसार इशानी नदी तट पर माता सती का अधर (होंठ) गिरने से इस स्थल को फुल्लारा अट्टहास शक्तिपीठ के रूप में जाना गया।
तंत्र चूड़ामणि में इस पीठ का उल्लेख इस प्रकार मिलता है:
“अट्टहासे चोष्ठपातो देवी फुल्लरा स्मृता।
विश्वेश भैरवस्तत्र…”
जिससे यह स्थान तांत्रिक और शाक्त परंपरा में विशेष महत्व रखता है।
नीले कमल की परंपरा (लोकमान्यता)
स्थानीय परंपराओं में एक कथा प्रचलित है कि भगवान राम के समय माँ दुर्गा की पूजा हेतु 108 नीले कमलों की आवश्यकता हुई थी। लोककथाओं के अनुसार, हनुमानजी ने इस क्षेत्र के सरोवर से कमल लाकर पूजा में अर्पित किए।
इसे रामायण काल और शक्ति उपासना के सांस्कृतिक संयोग के रूप में देखा जाता है।
ऐतिहासिक निर्माण और राजकीय संरक्षण
ऐतिहासिक साक्ष्यों और परंपराओं के अनुसार यह शक्तिपीठ 500 वर्षों से अधिक प्राचीन माना जाता है।
1915 ई. में संग्रहालय में सुरक्षित मूल प्रतिमा की पुनःस्थापना की गई थी।
प्रतिमा का स्वरूप होंठाकार पाषाण के रूप में वर्णित है
क्षेत्रीय राजवंशों जैसे पाल-सेन वंश द्वारा संरक्षण की परंपरा रही
आदिशूर बंगाधिपति और वेदगर्भ काल से जुड़ी भूमि-दान परंपराओं का उल्लेख मिलता है
यह स्थल बंगाल की शाक्त-तांत्रिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
वास्तुकला और परिसर विवरण
फुल्लारा प्रतिमा – होंठाकार पाषाण संरचना
पवित्र सरोवर – ऐतिहासिक रूप से धार्मिक गतिविधियों से जुड़ा
पंचमुंडी आसन – तांत्रिक साधना परंपरा से संबंधित स्थल
विश्वेश्वर (भैरव) मंदिर – पीठ की संरक्षक परंपरा का प्रतीक
लगभग 66 बीघा क्षेत्रफल में फैला परिसर
इशानी नदी का प्राकृतिक परिवेश
यह सम्पूर्ण संरचना बंगाली स्थापत्य शैली और धार्मिक परंपरा का उदाहरण मानी जाती है।
पूजा विधि और धार्मिक परंपरा
मंदिर में पूजा-अर्चना स्थानीय परंपराओं के अनुसार संपन्न की जाती है।
दर्शन समय:
प्रातः: 5:30 AM – 1:00 PM
सायं: 3:30 PM – 8:30 PM
पूजा क्रम परंपरागत रूप से भोग, आरती और संध्या पूजा के रूप में संपन्न होता है।
इन अनुष्ठानों को श्रद्धालु आस्था और परंपरा के रूप में अपनाते हैं।
(यहाँ किसी भी प्रकार के फल, सिद्धि या परिणाम की गारंटी नहीं मानी जाती।)
यात्रा मार्गदर्शिका
| स्थान | दूरी | साधन |
|---|---|---|
| कोलकाता | ~200 किमी | ट्रेन / सड़क |
| बोलपुर | ~40 किमी | बस |
| अहमदपुर | ~11 किमी | ऑटो |
| दुर्गापुर | ~80 किमी | टैक्सी |
आवास: मंदिर धर्मशाला (उपलब्धता स्थानीय प्रबंधन पर निर्भर)
भोजन: अन्न-भोग प्रसाद (धार्मिक परंपरा के अनुसार)
आसपास के प्रमुख शक्ति स्थल (सूचनात्मक)
| स्थल | दूरी | पारंपरिक संबद्धता |
|---|---|---|
| तारा पीठ | ~80 किमी | शाक्त परंपरा |
| मंगल चंडी | ~100 किमी | देवी उपासना |
| भ्रामरी | ~150 किमी | शक्तिस्थल |
त्योहार और सांस्कृतिक आयोजन
माघ पूर्णिमा मेला – वार्षिक धार्मिक आयोजन
नवरात्रि और शिवरात्रि – विशेष पूजा काल
इन अवसरों पर श्रद्धालु सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं में सहभाग करते हैं।
निष्कर्ष
फुल्लारा अट्टहास शक्तिपीठ को शाक्त और तांत्रिक परंपरा में एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक तीर्थ के रूप में देखा जाता है।
यह स्थल पौराणिक कथाओं, बंगाली स्थापत्य और स्थानीय आस्था का संगम प्रस्तुत करता है।
जो श्रद्धालु पश्चिम बंगाल के प्रमुख शक्ति स्थलों को जानना चाहते हैं, उनके लिए यह पीठ धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
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