स्वास्थ्य का सनातन सूत्र: शरीर, मन और आत्मा का संतुलन

स्वास्थ्य का सनातन सूत्र
यह लेख “स्वास्थ्य” की सनातन अवधारणा को दार्शनिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। इसमें प्रयुक्त सभी संदर्भ प्रतीकात्मक हैं और किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह, निदान या उपचार का उद्देश्य नहीं रखते।
शरीर, मन और आत्मा का संतुलन
चरण 1: स्वास्थ्य की सही परिभाषा को समझना
आम तौर पर स्वास्थ्य को केवल बीमारी न होना मान लिया जाता है, लेकिन सनातन शास्त्रों में स्वास्थ्य का अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा है।
शास्त्रीय सूत्र (चरक संहिता)
स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं
(यह सूत्र दार्शनिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ में उद्धृत है, न कि चिकित्सीय निर्देश के रूप में।)
अर्थ
जो स्वस्थ है, उसके स्वास्थ्य की रक्षा करना और जो रोगी है, उसके रोग को शांत करना।
इससे स्पष्ट होता है कि स्वास्थ्य एक सतत संतुलन की अवस्था है, केवल उपचार नहीं।
चरण 2: शरीर का संतुलन – स्थूल स्वास्थ्य का आधार
शरीर पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से निर्मित है।
इन तत्वों का संतुलन ही शारीरिक स्वास्थ्य का आधार है।
शास्त्रीय वचन
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्
अर्थ
शरीर ही धर्म और साधना का प्रथम साधन है।
शरीर स्वस्थ होगा तभी मन और आत्मा का विकास संभव है।
चरण 3: शरीर की उपेक्षा से स्वास्थ्य का ह्रास
जब मनुष्य:
असंयमित भोजन करता है
दिनचर्या बिगाड़ता है
प्रकृति के नियमों की अनदेखी करता है
तो शरीर रोग के रूप में चेतावनी देता है।
आयुर्वेदिक सिद्धांत
दोष वैषम्यं रोगः, दोष साम्यं स्वास्थ्यं
अर्थ
दोषों का असंतुलन रोग है, और दोषों का संतुलन ही स्वास्थ्य है।
चरण 4: मन का संतुलन – मानसिक स्वास्थ्य का मूल
सनातन दर्शन में मन को स्वास्थ्य की जड़ माना गया है।
शास्त्रीय सूत्र
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः
(यह सूत्र दार्शनिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ में उद्धृत है, न कि चिकित्सीय निर्देश के रूप में।)
अर्थ
मन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है।
अशांत मन = बिगड़ता स्वास्थ्य
शांत मन = स्थिर स्वास्थ्य
चरण 5: मन के विकार और स्वास्थ्य पर उनका प्रभाव
मन के प्रमुख विकार हैं:
क्रोध तब उत्पन्न होता है जब अपेक्षा पूरी नहीं होती और मन अपना संतुलन खो देता है।
भय भविष्य की अनिश्चितता या आत्म-विश्वास की कमी से पैदा होने वाली मानसिक अवस्था है।
चिंता आने वाले समय को लेकर बार-बार सोचते रहने से उत्पन्न मानसिक अशांति है।
लोभ आवश्यकता से अधिक पाने की इच्छा, जो मन को असंतुष्ट और अस्थिर बना देती है।
ये विकार लंबे समय तक रहने पर शारीरिक जीवन-अनुभव में असंतुलन की अनुभूति होने लगती है।
शास्त्रीय भाव
यद्भावं तद्भवति
जैसे विचार होते हैं, वैसा ही जीवन और वैसा ही स्वास्थ्य की दार्शनिक अवस्था मानी जाती है।
चरण 6: ध्यान द्वारा मन और स्वास्थ्य का संतुलन
ध्यान मन को स्थिर करता है और भीतर की अशांति को शांत करता है।
शांति मंत्र
अर्थ
शरीर की शांति, मन की शांति और आत्मा की शांति।
जहाँ शांति है, वहीं वास्तविक स्वास्थ्य है।
चरण 7: आत्मा को समझे बिना पूर्ण स्वास्थ्य संभव नहीं
आत्मा न रोगी होती है, न दुखी, न नष्ट होती है।
भगवद्गीता का वचन
न जायते म्रियते वा कदाचित्
अर्थ
आत्मा न जन्म लेती है और न कभी मरती है।
आत्मा से जुड़ाव = भयमुक्त जीवन = गहरा स्वास्थ्य
चरण 8: आत्मबोध से स्वास्थ्य में स्थायित्व
जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि:
मैं केवल यह शरीर नहीं हूँ जो दिखाई देता है।
मैं वह नहीं हूँ जो जन्म लेता है, बढ़ता है और एक दिन नष्ट हो जाता है।
यह शरीर तो केवल मेरा आवास है,
एक अस्थायी साधन, जिसके माध्यम से मैं जीवन का अनुभव करता हूँ।मैं वह चेतना हूँ जो शरीर के भीतर रहते हुए भी उससे स्वतंत्र है।
दर्द शरीर को होता है,
चिंता मन में उठती है,
पर जो इन सबको देख रहा है, वह मैं हूँ।जब मैं स्वयं को केवल शरीर मान लेता हूँ,
तब हर पीड़ा मुझे अपनी लगने लगती है,
हर भय मुझे जकड़ लेता है,
और हर परिवर्तन मुझे अस्थिर कर देता है।पर जिस क्षण मैं यह समझ लेता हूँ कि,
मैं केवल शरीर नहीं हूँ,
उसी क्षण भीतर एक शांति उतरने लगती है।क्योंकि तब मैं जानता हूँ:
शरीर बदलता है, मैं नहीं
परिस्थितियाँ आती-जाती हैं, मैं साक्षी बना रहता हूँ
रोग आते हैं, पर मेरी चेतना अछूती रहती है
यह बोध मुझे मृत्यु के भय से मुक्त करता है,
अपेक्षाओं के बोझ से हल्का करता है,
और जीवन को संघर्ष नहीं, अनुभव बना देता है।“मैं केवल शरीर नहीं हूँ”,
यह वाक्य कोई कल्पना नहीं,
यह स्वास्थ्य की सबसे गहरी अवस्था है।क्योंकि जब मैं अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता हूँ,
तो मन शांत हो जाता है,
संतुलन की अनुभूति होती है,
और जीवन स्वयं सरल हो जाता है।यही आत्मबोध है।
यही भीतर से उपजा हुआ सच्चा स्वास्थ्य है।
तो:
मृत्यु का भय कम होता है
तनाव घटता है
मन स्थिर होता है
उपनिषदिक महावाक्य
अहं ब्रह्मास्मि, नाहं देहो न मनः।
(मैं केवल शरीर या मन नहीं हूँ, मैं वही शुद्ध चेतना हूँ जो सर्वत्र व्याप्त है।)
आत्मबोध से आंतरिक स्वास्थ्य जागृत होता है।
चरण 9: शरीर–मन–आत्मा का संतुलन ही पूर्ण स्वास्थ्य
सनातन दृष्टि में:
केवल शरीर स्वस्थ होना पर्याप्त नहीं
केवल मन शांत होना भी अधूरा है
तीनों का संतुलन ही पूर्ण स्वास्थ्य है।
गीता सूत्र
समत्वं योग उच्यते
(यह सूत्र दार्शनिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ में उद्धृत है, न कि चिकित्सीय निर्देश के रूप में।)
अर्थ
संतुलन ही योग है, और योग ही स्वास्थ्य है।
चरण 10: स्वास्थ्य को जीवन-यात्रा बनाना
स्वास्थ्य कोई एक दिन में मिलने वाला लक्ष्य नहीं,
यह जीवन भर चलने वाली सचेत यात्रा है।
सर्वजन स्वास्थ्य मंत्र
अर्थ
सभी सुखी हों, सभी निरोग हों।
यही सनातन स्वास्थ्य यात्रा का अंतिम संदेश है।
विशेष सूचना (महत्वपूर्ण श्रेय)
शर्मा जी की यात्रा की टीम को यह संपूर्ण सनातन स्वास्थ्य पर दार्शनिक एवं जीवन-अनुभव आधारित दृष्टि संकल्प इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटेड मेडिकल साइंस, तेहरा, आगरा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी आचार्य कुलदीप भवानी जी द्वारा प्रदान किया गया है, जो—
योगाचार्य (संस्कृत विश्व विद्यालय, हरिद्वार)
नेचर केयर थेरपिस्ट (प्राकृतिक चिकित्सक)
और वेलनेस कोच हैं।
यह ज्ञान व्यावहारिक अनुभव, शास्त्रीय अध्ययन और प्राकृतिक चिकित्सा पर आधारित है।
निष्कर्ष (एक पंक्ति में सत्य)
यदा शरीरं प्रकृतिस्थं, मनः शान्तिस्थं, आत्मा सत्ये प्रतिष्ठिता।
तदा एव परमं स्वास्थ्यं प्रकटते॥जब शरीर प्रकृति के साथ संतुलन में होता है,
मन शांति में स्थित होता है
और आत्मा सत्य में प्रतिष्ठित रहती है,
तभी वास्तविक और पूर्ण स्वास्थ्य प्रकट होता है।
विशेष सूचना
संकल्प इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटेड मेडिकल साइंस, तेहरा, आगरा की आधिकारिक वेबसाइट वर्तमान में निर्माणाधीन है और शीघ्र ही लाइव की जाएगी।
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| संकल्प इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटेड मेडिकल साइंस, तेहरा, आगरा | शर्मा जी की यात्रा |
महत्वपूर्ण सूचना:
अस्वीकरण: यह सामग्री केवल दार्शनिक एवं सांस्कृतिक जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह, निदान, उपचार या स्वास्थ्य परिणाम की गारंटी नहीं देता। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी निर्णय से पहले योग्य चिकित्सक या विशेषज्ञ से परामर्श आवश्यक है।


