सनातन दर्शन में रोग की अवधारणा: मन और आत्मा के संदर्भ में एक दार्शनिक दृष्टि

आज का मनुष्य रोग से डरता है
आज का मनुष्य रोग से डरता है।
वह रोग को अपना शत्रु मानकर दवाओं से उसे जल्द-से-जल्द दबा देना चाहता है, बिना यह समझे कि रोग क्यों उत्पन्न हुआ।
संकल्प इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटेड मेडिकल साइंस, तेहरा आगरा के निदेशक डॉ. अभिषेक कुमार गुप्ता जी के अनुसार, दार्शनिक दृष्टि से रोग शत्रु नहीं बल्कि शरीर द्वारा दिया गया संकेत माना जाता है, जिसे समझे बिना केवल दबाने का प्रयास जीवन-संतुलन को और जटिल बना सकता है।
(यह विचार जीवन-दर्शन के संदर्भ में है, न कि चिकित्सीय सलाह के रूप में।)
लेकिन सनातन दर्शन एक प्रश्न पूछता है—
क्या रोग वास्तव में शत्रु है?
या वह कोई संदेश है, जिसे हम समझ नहीं पा रहे?
सनातन दृष्टि में रोग को दुश्मन नहीं, दूत (प्रतीकात्मक संदेश) माना गया है।
रोग शब्द का वास्तविक अर्थ
“रोग” शब्द की व्युत्पत्ति
संस्कृत में “रोग” शब्द बना है—
रुज् धातु से
जिसका अर्थ है:
कष्ट देना
पीड़ा उत्पन्न करना
असंतुलन का संकेत देना
अर्थात दार्शनिक दृष्टि में रोग कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि असंतुलन की अभिव्यक्ति माना गया है।
सनातन परिभाषा: रोग क्या है?
आयुर्वेदिक सूत्र (दार्शनिक संदर्भ)
दोष वैषम्यं रोगः
दोष साम्यं स्वास्थ्यं
अर्थ:
दोषों का असंतुलन = रोग
दोषों का संतुलन = स्वास्थ्य
यह सूत्र जीवन-संतुलन की अवधारणा को दर्शाता है, न कि किसी रोग का चिकित्सीय निदान।
आधुनिक दृष्टि बनाम सनातन दृष्टि (वैचारिक तुलना)
| आधुनिक सोच | सनातन दृष्टि |
|---|---|
| रोग बाहरी कारण से | रोग आंतरिक असंतुलन के संकेत के रूप में |
| रोग को दबाना | रोग को समझने का प्रयास |
| लक्षण पर ध्यान | जीवन-कारणों पर विचार |
| दवा प्राथमिक | जीवनशैली पर चिंतन |
सनातन दृष्टि प्रतीकात्मक रूप से कहती है—
रोग शरीर में नहीं, जीवन-लय में जन्म लेता है।
शरीर: रोग का पहला प्रकट स्थल, कारण नहीं
एक सामान्य भ्रम यह है कि—
“शरीर ही रोग पैदा करता है”
सनातन दर्शन दार्शनिक रूप से स्पष्ट करता है:
शरीर रोग उत्पन्न नहीं करता
शरीर रोग को प्रकट करता है
शास्त्रीय भाव:
शरीर संकेत देता है, निर्णय नहीं करता
पंचमहाभूत और रोग (प्रतीकात्मक विवेचना)
शरीर को पंचमहाभूतों की संरचना माना गया है:
पृथ्वी तत्व — असंतुलन का संकेत → संरचना-संबंधी कमजोरी का बोध
जल तत्व — असंतुलन का संकेत → द्रव-संतुलन पर विचार
अग्नि तत्व — असंतुलन का संकेत → पाचन-अनुशासन पर संकेत
वायु तत्व — असंतुलन का संकेत → गति और मानसिक चंचलता का बोध
आकाश तत्व — असंतुलन का संकेत → सूक्ष्म स्तर पर रिक्तता का अनुभव
यह विवेचना दार्शनिक और प्रतीकात्मक है, चिकित्सीय विवरण नहीं।
निष्कर्ष (दार्शनिक):
रोग कोई शत्रु नहीं, बल्कि जीवन-संतुलन में आए परिवर्तन का संकेत माना गया है।
जीवनशैली और रोग का संबंध (दर्शन के अनुसार)
सनातन दृष्टि में रोग के संकेतक कारणों में शामिल माने गए हैं:
असमय भोजन → जीवन-अनुशासन में भ्रम
अति भोजन → संतुलन का भार
प्राकृतिक लय से कटाव → जैविक अनुशासन पर प्रभाव
विश्राम की कमी → आत्म-पुनर्नवीकरण में बाधा
यह विवेचना जीवन-दृष्टि के संदर्भ में है।
शरीर की चेतावनियाँ जिन्हें हम अनदेखा करते हैं
शरीर पहले संकेत देता है—
थकान
भारीपन
बेचैनी
नींद की कमी
ये लक्षण नहीं, बल्कि जीवन-लय के संकेत माने गए हैं। जब इन्हें अनसुना किया जाता है, तब असंतुलन गहराता है।
रोग क्यों बढ़ रहे हैं? (सनातन विश्लेषण)
आज:
भोजन है, पर चेतना नहीं
सुविधा है, पर संतुलन नहीं
ज्ञान है, पर आत्मबोध नहीं
इसी दार्शनिक दृष्टि से कहा जाता है कि—
प्रकृति से दूरी = जीवन-असंतुलन की निकटता
रोग और अहंकार (दार्शनिक भाव)
जब मनुष्य सोचता है—
“मैं प्रकृति से ऊपर हूँ”
तभी असंतुलन प्रारंभ होता है।
शास्त्रीय भाव:
अहंकार से असंतुलन,
असंतुलन से जीवन-पीड़ा
रोग: दंड नहीं, दिशा
सनातन दृष्टि में रोग को:
दंड नहीं
भय नहीं
बल्कि दिशा-सूचक माना गया है
यदि रोग को समझा जाए, तो वही जीवन-गुरु बन सकता है।
(यह कथन दार्शनिक अर्थ में है।)
सार
रोग आकस्मिक नहीं → जीवन-असंतुलन का परिणाम माना गया है
रोग शत्रु नहीं → शरीर की भाषा में बोला गया संदेश
शरीर कारण नहीं → दर्पण है
जीवन-शैली ही अंततः शरीर में प्रतिबिंबित होती है
समापन
जो दिखाई दे रहा है, वह केवल रोग नहीं,
बल्कि हमारी जीवन-लय का प्रतिबिंब है।
| संकल्प इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटेड मेडिकल साइंस, तेहरा आगरा |
महत्वपूर्ण सूचना
यह लेख सनातन परंपरा और पारंपरिक भारतीय जीवन दर्शन पर आधारित सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह, उपचार, निदान या स्वास्थ्य परिणाम की गारंटी नहीं देता। स्वास्थ्य से संबंधित किसी भी निर्णय से पहले योग्य चिकित्सक या विशेषज्ञ से परामर्श आवश्यक है।


