आत्मा, चेतना और रोग का सनातन दृष्टिकोण

आत्मा, चेतना और रोग से मुक्ति का शाश्वत मार्ग
आत्मा, चेतना और रोग से मुक्ति का शाश्वत मार्ग की भूमिका: जहाँ से वास्तविक उपचार आरंभ होता है
भाग–1 में हमने जाना कि रोग शरीर में क्यों प्रकट होता है।
भाग–2 में समझा कि मन, भावनाएँ और कर्म कैसे रोग का बीज बनते हैं।
अब प्रश्न यह है—
यदि शरीर और मन से आगे बढ़कर देखा जाए,
तो रोग की अंतिम जड़ कहाँ है?
सनातन दृष्टि का उत्तर है—
आत्मा से दूरी।
आत्मा और रोग का संबंध
सनातन दर्शन में आत्मा:
शुद्ध है
अविनाशी है
रोगरहित है
भगवद्गीता का वचन
न जायते म्रियते वा कदाचित्
अर्थात आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है, न रोगी होती है।
इसलिए रोग आत्मा में नहीं,
आत्मा से कटे हुए जीवन में उत्पन्न होता है।
जब मनुष्य स्वयं को केवल शरीर मान लेता है
रोग की गहराई में जाएँ तो एक मूल भ्रांति दिखती है—
“मैं यही शरीर हूँ”
जब व्यक्ति स्वयं को केवल शरीर मानता है:
मृत्यु का भय बढ़ता है
असुरक्षा बढ़ती है
चिंता स्थायी हो जाती है
और यही भय, चिंता और असुरक्षा रोग का स्थायी आधार बन जाते हैं।
आत्मबोध और स्वास्थ्य
आत्मबोध का अर्थ है—
स्वयं को शरीर, मन और भूमिका से अलग पहचानना
उपनिषदिक महावाक्य
अहं ब्रह्मास्मि
जब यह बोध जाग्रत होता है:
भय ढीला पड़ता है
मन शांत होता है
शरीर स्वतः संतुलन में आने लगता है
आत्मबोध = आंतरिक स्वास्थ्य
रोग क्यों आत्मिक संकेत होता है?
सनातन दृष्टि में रोग पूछता है:
क्या तुम अपने जीवन से संतुष्ट हो?
क्या तुम प्रकृति के साथ जी रहे हो?
क्या तुम स्वयं को सुन रहे हो?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर “नहीं” है,
तो रोग संकेत बनकर प्रकट होता है।
रोग दंड नहीं, संदेश है।
चेतना का स्तर और रोग
चेतना के तीन स्तर माने गए हैं:
स्थूल – केवल शरीर केंद्रित
सूक्ष्म – मन और भावनाओं से जुड़ा
कारण – आत्मा और साक्षी भाव
जितनी चेतना सीमित, उतना रोग गहरा।
जैसे-जैसे चेतना विस्तृत होती है, रोग का प्रभाव कम होने लगता है।
रोग से मुक्ति का सनातन मार्ग
सनातन दृष्टि रोग से मुक्ति के लिए तीन समानांतर मार्ग बताती है—
(1) शरीर का संतुलन
प्राकृतिक आहार
नियमित दिनचर्या
पर्याप्त विश्राम
(2) मन की शुद्धि
ध्यान
स्वीकृति
भावनाओं का सम्मान
(3) आत्मा से जुड़ाव
आत्मचिंतन
साक्षी भाव
अहंकार का क्षय
तीनों का समन्वय ही पूर्ण उपचार है।
ध्यान: आत्मा और शरीर के बीच सेतु
ध्यान वह प्रक्रिया है जिसमें:
मन शांत होता है
शरीर शिथिल होता है
आत्मा से जुड़ाव होता है
शांति मंत्र
ध्यान रोग को तुरंत नहीं मिटाता, पर रोग की जड़ को ढीला कर देता है।
स्वीकार: सबसे बड़ा उपचार
जब व्यक्ति कहता है—
“मैं जैसा हूँ, वैसा स्वीकार करता हूँ”
तो:
मन लड़ना छोड़ देता है
शरीर तनाव छोड़ देता है
स्वीकार का अर्थ हार नहीं, स्वीकार का अर्थ समझ है।
रोग से लड़ना नहीं, रोग को समझना
आधुनिक जीवन रोग से युद्ध सिखाता है। सनातन जीवन रोग से संवाद सिखाता है।
जब रोग से पूछा जाए—
“तू क्यों आया है?”
तो रोग उत्तर देता है—
“तुम्हें स्वयं से मिलाने।”
क्या रोग हमेशा समाप्त हो जाता है?
सनातन दृष्टि ईमानदार है।
कभी रोग पूरी तरह चला जाता है
कभी उसका प्रभाव कम हो जाता है
और कभी रोग रहते हुए भी व्यक्ति पीड़ा से मुक्त हो जाता है
यही वास्तविक स्वास्थ्य है।
स्वास्थ्य की अंतिम सनातन परिभाषा
स्वास्थ्य वह अवस्था है
जहाँ शरीर प्रकृति में,
मन शांति में
और आत्मा सत्य में स्थित होती है।
संस्कृत भावात्मक सूत्र
यदा शरीरं प्रकृतिस्थं, मनः शान्तिस्थं, आत्मा सत्ये प्रतिष्ठिता।
तदा एव परमं स्वास्थ्यं प्रकटते॥
आज के मनुष्य के लिए सनातन संदेश
आज मनुष्य:
तेज है, पर थका हुआ
साधन संपन्न है, पर अशांत
जीवित है, पर जुड़ा नहीं
सनातन दृष्टि कहती है—
गति कम करो, गहराई बढ़ाओ।
यहीं से रोग का अंत शुरू होता है।
रोग: जीवन को मोड़ देने वाला अवसर
बहुत से लोग रोग के बाद:
जीवन बदलते हैं
प्राथमिकताएँ समझते हैं
स्वयं से जुड़ते हैं
इस दृष्टि से देखें तो—
रोग कई बार वरदान भी होता है।
भाग–3 का सार
रोग आत्मा में नहीं होता
रोग आत्मा से दूरी का परिणाम होता है
आत्मबोध से भय समाप्त होता है
भय के हटते ही रोग की जड़ ढीली पड़ती है
स्वास्थ्य एक अवस्था है, केवल परिणाम नहीं
पूर्ण निष्कर्ष
रोग क्यों उत्पन्न होता है?
क्योंकि मनुष्य स्वयं से दूर हो गया है।
जब वह लौटता है—
प्रकृति की ओर
शांति की ओर
और सत्य की ओर
तो रोग का कारण समाप्त होने लगता है।
अंतिम वाक्य
**रोग शरीर की समस्या नहीं,
चेतना की पुकार है।जो इस पुकार को सुन लेता है,
वही वास्तव में स्वस्थ हो जाता है।**
आचार्य कुलदीप भवानी
मुख्य कार्यकारी अधिकारी
संकल्प इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंटीग्रेटेड मेडिकल साइंस
NH-3, आगरा-ग्वालियर रोड, शांति निकेतन पब्लिक स्कूल के पास
तेहरा, आगरा (कॉन्टैक्ट: 7668077753)
महत्वपूर्ण सूचना:
यह लेख सनातन परंपरा और पारंपरिक भारतीय जीवन दर्शन पर आधारित सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह, उपचार, निदान या स्वास्थ्य परिणाम की गारंटी नहीं देता। स्वास्थ्य से संबंधित किसी भी निर्णय से पहले योग्य चिकित्सक या विशेषज्ञ से परामर्श आवश्यक है।
“यह लेख स्पष्ट रूप से आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विमर्श है। इसमें ‘रोग’ शब्द का प्रयोग सांस्कृतिक-प्रतीकात्मक संदर्भ में किया गया है, न कि चिकित्सीय समाधान के रूप में। कोई भी ऐसा तत्व नहीं है जो इसे medical advice या misleading health content बनाए।”


