कुमारी शक्तिपीठ (पश्चिम बंगाल)

कुमारी शक्तिपीठ (पश्चिम बंगाल)

सम्पूर्ण इतिहास, पौराणिक कथा, महत्व एवं यात्रा मार्ग

कुमारी शक्तिपीठ भारत के इक्यावन प्राचीन शक्तिपीठों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पूजनीय शक्तिस्थल है। यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल की पवित्र भूमि पर स्थित माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इसी स्थान पर देवी सती का दाहिना कर्ण (कान) गिरा था।

यह स्थल केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि शक्ति-साधना, तांत्रिक परंपरा और देवी उपासना का प्राचीन केंद्र रहा है। यहाँ देवी कुमारी के रूप में तथा भैरव भीमरूप के रूप में पूजे जाते हैं।


1 पौराणिक इतिहास (शक्तिपीठ की उत्पत्ति)

पुराणों के अनुसार, राजा दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में भगवान शिव का घोर अपमान किया गया। राजा दक्ष ने जानबूझकर भगवान शिव को यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया और उन्हें अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया। यह अपमान माता सती के लिए असहनीय था, क्योंकि भगवान शिव उनके पति और आराध्य थे।

पति के अपमान से व्यथित होकर माता सती ने योगाग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया। जब भगवान शिव को इस घटना का ज्ञान हुआ, तो वे अत्यंत क्रोधित होकर माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे। सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंग-प्रत्यंग पृथ्वी पर विभक्त कर दिए।

जहाँ-जहाँ माता सती के अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई। मान्यता है कि कुमारी शक्तिपीठ में माता सती का दाहिना कर्ण (कान) गिरा था।


2 शास्त्रीय उल्लेख और प्रमाण

🔸 तंत्र-चूड़ामणि

इस ग्रंथ में उल्लेख मिलता है कि—

“यत्र कर्णं पतितं तत्र कुमारी देशः प्रसीदति।”
अर्थात जहाँ माता सती का कर्ण गिरा, वही क्षेत्र कुमारी कहलाया।

🔸 कालिका पुराण

यहाँ देवी कुमारी को भवानी का शांत, सौम्य एवं ज्ञानमय स्वरूप बताया गया है।

🔸 देवी भागवत पुराण

इस शक्तिपीठ को श्रवण-तत्त्व और ज्ञान-शक्ति से संबंधित स्थान कहा गया है।


3 ऐतिहासिक महत्व (कालक्रम अनुसार)

🔹 प्राचीन काल

स्थानीय परंपराओं के अनुसार, यह क्षेत्र गुप्त काल से ही शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र रहा है।

🔹 मध्यकाल

पाल वंश के समय बंगाल में शाक्त परंपरा को विशेष संरक्षण मिला। 10वीं से 12वीं शताब्दी के शिलालेखों में देवी कुमारी का उल्लेख मिलता है।

🔹 आधुनिक काल

वर्तमान समय में यह शक्तिपीठ धार्मिक आस्था, साधना और तीर्थ यात्रा का प्रमुख केंद्र है।


4 मंदिर की संरचना एवं स्थापत्य

कुमारी शक्तिपीठ का मंदिर बंगाली स्थापत्य शैली और तांत्रिक परंपरा का सुंदर संगम है।

मुख्य विशेषताएँ:

  • ऊँचा शिखर

  • गर्भगृह में काले पाषाण से निर्मित देवी कुमारी की प्रतिमा

  • भैरव भीमरूप का पृथक मंदिर

  • चारों ओर शांत और प्राकृतिक वातावरण

  • दीप, धूप और शंखध्वनि से युक्त आध्यात्मिक अनुभूति


5 देवी एवं भैरव का आध्यात्मिक स्वरूप

 देवी कुमारी

  • शुद्धता, ज्ञान और ऊर्जा का प्रतीक

  • श्रवण-शक्ति एवं विवेक का स्वरूप

  • साधना में एकाग्रता और मानसिक शुद्धि प्रदान करने वाली

 भैरव भीमरूप

  • साधकों के रक्षक

  • नकारात्मक शक्तियों से रक्षा

  • तांत्रिक साधना के मार्गदर्शक


6 प्रमुख पर्व एवं अनुष्ठान

  • नवरात्रि महोत्सव

  • दुर्गा पूजा (बंगाल परंपरा अनुसार)

  • कौमारी पूजा

  • दीपान उत्सव

  • शक्ति-साधना एवं तांत्रिक अनुष्ठान


7 दर्शन के आध्यात्मिक लाभ

कुमारी शक्तिपीठ के दर्शन से—

  • मन की शुद्धि होती है

  • नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है

  • ज्ञान और एकाग्रता में वृद्धि होती है

  • मनोकामनाओं की पूर्ति होती है

  • साधना में स्थिरता प्राप्त होती है


8 कैसे पहुँचें (यात्रा मार्ग)

📍 निकटतम प्रमुख शहर

कोलकाता, पश्चिम बंगाल

🚆 निकटतम रेलवे स्टेशन

हावड़ा एवं सियालदह

✈️ निकटतम हवाई अड्डा

नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, कोलकाता

🛣️ सड़क मार्ग

कोलकाता → बर्धमान → स्थानीय मार्ग → कुमारी शक्तिपीठ


9 आसपास के दर्शनीय स्थल

  • स्थानीय शक्ति मंदिर

  • बंगाल की ग्रामीण शाक्त संस्कृति

  • नदी तट एवं पवित्र स्थल

  • पारंपरिक सांस्कृतिक क्षेत्र


10 निष्कर्ष

कुमारी शक्तिपीठ केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि श्रवण-शक्ति, ज्ञान, तांत्रिक परंपरा और दिव्य चेतना का प्रतीक है। जो श्रद्धालु शक्ति उपासना के गूढ़ रहस्यों को समझना चाहते हैं, उनके लिए यह शक्तिपीठ अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

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