बद्रीनाथ धाम मंदिर – चमोली का चार धाम दिव्य तीर्थ

बद्रीनाथ धाम मंदिर – चमोली का चार धाम दिव्य तीर्थ

बद्रीनाथ धाम का परिचय

बद्रीनाथ धाम – उत्तराखंड का पवित्र तीर्थ

बद्रीनाथ धाम उत्तराखंड के चमोली जिले में अलकनंदा नदी के तट पर हिमालय की गोद में विराजमान है। यह भारत के चार धामों में से एक प्रमुख तीर्थस्थान है। स्कंद पुराण के मानस खंड में बद्रीनाथ धाम का विस्तृत वर्णन मिलता है। वहीं दूसरी ओर पद्म पुराण में इसे विष्णु की प्रमुख तपस्थली बताया गया है।

इसलिए हर वर्ष लाखों भक्त बद्रीनाथ धाम की कठिन पैदल यात्रा कर दर्शन के लिए आते हैं। विशेष रूप से यह धाम चार धाम यात्रा का अंतिम पड़ाव है। इसके अलावा गरुड़ पुराण में बद्रीनाथ धाम को मोक्षप्रद तीर्थ कहा गया है। इसी कारण भक्त इसे जीवन का सबसे पवित्र यज्ञ मानते हैं।

बद्रीनाथ धाम की ऊँचाई समुद्र तल से 3133 मीटर है। चारों ओर हिमाच्छादित चोटियाँ हैं। वहीं दूसरी ओर नीलकंठ पर्वत इसकी पृष्ठभूमि बनाता है। परिणामस्वरूप यह धाम प्रकृति और आध्यात्म का अनुपम संगम है।

बद्रीनाथ धाम की पौराणिक कथा

बद्रीनाथ धाम – भगवान विष्णु की तपस्थली

स्कंद पुराण के अनुसार भगवान विष्णु ने बद्रीनाथ धाम में बद्री वन में कठोर तपस्या की थी। कहा जाता है कि नारद मुनि ने भगवान से प्रार्थना की कि वे भक्तों के कल्याण हेतु साकार रूप धारण करें। मान्यता है कि इसी विनय पर भगवान ने बद्रीनाथ धाम में स्वयंभू मूर्ति के रूप में अवतरण किया।

पद्म पुराण के उत्तर खंड में वर्णन है कि महर्षि नारद ने बद्री वन में तपस्या करते हुए भगवान विष्णु को देखा। वहीं दूसरी ओर विष्णु पुराण में बद्रीनाथ धाम को वैकुंठ का द्वार कहा गया है। इसके अलावा भागवत पुराण के चतुर्थ स्कंध में बद्री मुनि की कथा से इसका नाम पड़ा।

बद्रीनाथ धाम पर नर-नारायण तपस्थली भी है। पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने नर और नारायण दोनों रूपों में यहां तपस्या की। विशेष रूप से नर रूप में अर्जुन बने और नारायण रूप में स्वयं भगवान रहे। साथ ही महाभारत के वन पर्व में भी बद्रीनाथ धाम का उल्लेख है।

गरुड़ पुराण में लिखा है कि बद्रीनाथ धाम के दर्शन मात्र से 88,000 ऋषियों के तप का पुण्य प्राप्त होता है। इसलिए भक्त इसे अत्यंत पवित्र मानते हैं। वहीं दूसरी ओर ब्रह्म पुराण में तप्त कुंड का विशेष महत्व बताया गया है।

बद्रीनाथ धाम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

बद्रीनाथ धाम – आदि शंकराचार्य का योगदान

बद्रीनाथ धाम का इतिहास सहस्राब्दियों पुराना है। स्कंद पुराण में इसका उल्लेख 5वीं शताब्दी से पूर्व का लगता है। वहीं दूसरी ओर चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में बद्रीनाथ धाम का वर्णन किया। परिणामस्वरूप यह प्राचीन काल से विख्यात रहा।

आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में बद्रीनाथ धाम की यात्रा की। उन्होंने बर्फ के नीचे दबे मंदिर को खोजा। विशेष रूप से उन्होंने काले पत्थर की स्वयंभू मूर्ति को स्थापित किया। साथ ही शंकराचार्य ने चार मठों की स्थापना की जिनमें ज्योतिर्मठ बद्रीनाथ धाम का प्रमुख केंद्र है।

16वीं शताब्दी में गढ़वाल के राजा प्रताप शाह ने बद्रीनाथ धाम का भव्य पुनर्निर्माण कराया। वहीं दूसरी ओर 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश काल में भी यात्रा जारी रही। परिणामस्वरूप आज बद्रीनाथ धाम आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा के अभिलेखों में भी बद्रीनाथ धाम का उल्लेख मिलता है। विशेष रूप से पांडुलिपियों में राजा भोज और चोल राजाओं के दान का विवरण है। अंततः यह धाम भारतीय सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक है।

बद्रीनाथ धाम की वास्तुकला

बद्रीनाथ धाम – उत्तर भारतीय शैली का श्रृंगार

बद्रीनाथ धाम का मुख्य मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली में निर्मित है। इसका शिखर पंच-रथ प्रकार का है। वहीं दूसरी ओर तीन मंजिला संरचना अत्यंत भव्य है। मुख्य द्वार पर सिंह स्तंभ हैं।

मंदिर का गर्भगृह ग्रेनाइट पत्थर से बना है। इसके अलावा सोने का मंडप विशेष आकर्षण रखता है। बद्रीनाथ धाम की प्रतिमा 1 फुट ऊँची काले संगमरमर की है। चार भुजाएँ हैं – खट्वांग, शंख, चक्र, गदा।

विशेष रूप से गरुड़ जी की कांस्य प्रतिमा सिंहासन पर विराजमान है। वहीं दूसरी ओर लक्ष्मी माता की मूर्ति भी है। परिणामस्वरूप यह विष्णु-लक्ष्मी स्वरूप का प्रतीक है। मंदिर परिसर में 15 छोटे मंदिर हैं।

सिंह द्वार और तप्त कुंड का निर्माण भी प्राचीन शैली में है। इसके अलावा शेष ध्वज ध्वजस्तंभ पर हमेशा लहराता रहता है। अंततः बद्रीनाथ धाम वास्तुकला सनातन धर्म की भव्यता दर्शाती है।

महत्वपूर्ण लिंक्स

आंतरिक लिंक्स 

बाहरी लिंक्स

इस मंदिर से जुड़ा अनुभव साझा करें:

Sign In

Register

Reset Password

Please enter your username or email address, you will receive a link to create a new password via email.